जिंदगी भी यह खेल बार-बार खेलती है,
खुशियां बेशुमार देकर, उनका हिसाब रखती है।
दर्द मे जीना सिखाकर, एहसान करती है
जिंदगी भी यह खेल बार-बार खेलती है।
रोशनी की चमक दिखाकर, अंधेरा का इंतजार करती है,
तन्हा रात के बाद, नई सुबह का इकरार करती है।
चैन भरी नींदे लेकर, बेचैनी इनायत करती है
जिंदगी भी यह खेल बार-बार खेलती है।
आंसुओं का सौदा मुस्कराहट से हर बार करती है,
तोड़कर मुझे, मज़बूत बनाने की चाहत बरकरार रखती है।
अपने इस खेल मे मुझे भी बराबर का साझीदार समझती है
जिंदगी भी यह खेल बार-बार खेलती है।
सूखो के सागर मे लेजाकर, दु:खो की कशती मे डुबाती है
आस्मान के सपने दिखाकर, जमीन की गहराई समझाती है।
अपनी उंगलियो पर नचाकर, जायके का लुत्फ उठाती है
जिंदगी भी यह खेल बार-बार खेलती है।
©Anuradha
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